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अमेरिका के कठोर कदम से रूस और अमेरिका के बीच बढ़ा तनाव

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By: संजीव ठाकुर

Apna Lakshya News: परंपरागत रूप से अमेरिका और रूस महाशक्ति बनने की होड़ में एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं। रूस एशिया और खासकर चाइना, भारत को अपने साथ में रखकर अमेरिका जैसी महाशक्ति को हमेशा संतुलित करने का प्रयास करता रहा है। क्योंकी यूरोपीय देश तथा ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा अमेरिका के प्रभाव में रहे हैं,और संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थाई सदस्य अमेरिका का सदैव साथ देते रहे हैं,

ऐसे में अचानक जो बाइडेन सरकार ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में रूस के डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में हस्तक्षेप को लेकर रूस के दस राजनयिकों को निष्कासित कर दिया है। इसके बाद अमेरिका राष्ट्रपति ने रूस के व्लादिमीर पुतिन को वार्ता का प्रस्ताव भी रखा है, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन चुनाव जीतने के बाद रूस की अमेरिकी चुनाव में दखलंदाजी से रुष्ट होकर बयान भी जारी करते रहे है। पर 10 राजनयिकों को अचानक निकाले जाने की यह एक बड़ी कार्रवाई है। जिससे अमेरिका तथा रूस के बीच संबंधों में काफी खटास एवं बेरुखी आ सकती है।

यह उल्लेखनीय है की दोनों देश के अधिकारियों ने आगामी शिखर सम्मेलन की संभावनाओं पर गहन विमर्श किया था। अमेरिका ने रूस की दखल अंदाजी एवं संघीय एजेंसियों को हैक करने के प्रमाण प्राप्त होने के बाद दोषी ठहराते हुए इन राजनयिक को अमेरिका से बाहर कर दिया है, इसके अलावा रूस की कई कंपनियां और संस्थाओं से संबंधित 30 लोगों पर प्रतिबंध भी आरोपित कर दिया है। निष्कासन और प्रतिबंध के आदेश के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद व्हाइट हाउस से अमेरिकी राष्ट्रपति ने बताया कि रूस के व्लादिमीर पुतिन के साथ टेलीफोन पर चर्चा कर दोनों देशों के समक्ष आये कई मुद्दों पर समाधान के लिए आगामी समय में यूरोप में शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव भी पेश किया है। अमेरिका और रूस के साथ हथियारों के नियंत्रण एवं सुरक्षा क्षेत्र के सहयोग हेतु सामरिक स्थिरता शांति और सौहार्द्र के लिए वार्ता शुरू करना चाहती है।

इसी तरह ईरान और उत्तरी कोरिया में परमाणु संकट तथा अंतर्राष्ट्रीय महामारी कोविड-19 के विरुद्ध अमेरिका, रूस के साथ मिलकर काम करने की जरूरत पर भी वार्ता करना चाहता है। मूलता अमेरिका यूक्रेन की सीमा और क्रिमिया में रूसी सैनिकों के निर्माण कार्य पर भी काफी चिंतित है।
अमेरिका और रूस की यह प्रतिद्वंदिता लंबे समय से किन्ही कारणों को लेकर हमेशा बनी रहती आई है।रूस तथा अमेरिका एक दूसरे पर आरोप लगाने के कारणों के प्रमाण की तलाश में रहते हैं, एवं एक दूसरे पर आरोप लगाने से कभी नहीं चूकते।मूलत वैश्विक स्तर पर दोनों देश अपनी बादशाहत साबित करने के लिए अपनी अपनी शक्तियों का इजाफा कर अन्य देशों को अपने बाहुबली होने का प्रमाण देने की कोशिश करते हैं।

जिससे उन देशों का समर्थन प्राप्त कर सकें, गौरतलब है कि भारत को फौरी तौर पर शांति की पहल कर दोनों देशों के लिए मध्यस्था करवा कर शांति स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए यह प्रयास इसलिए भी आवश्यक है की कोविड-19 की दूसरी लहर से भारत इस बार बहुत ज्यादा प्रभावित तथा संक्रमित है इस स्थिति में वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करना ही सबसे बड़ा विकल्प होगा, पर जो बाइडेन के इस बड़े कदम से जाहिर है की व्लादीमीर पुतिन कतई प्रसन्न नहीं होंगे।

निश्चित तौर पर कुछ ना कुछ जवाबी कार्यवाही का प्रयास जरूर करेंगे, अब जबकि भारत के पिछले सात सालों से अमरीकी सरकार से अच्छे संबंध हो गए हैं, एवं कई सामरिक समझौते भी हुए हैं, शांति और सौहार्दता के कई पायदान पर दोनों देश काफी आगे बढ़ चुके हैं। ऐसे में भारत के सामने हमेशा धर्म संकट बना रहता है कि वह अमेरिका का समर्थन करे या अपने परंपरागत मित्र रूस का, यह समस्या हमेशा भारत के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी रहती है। रूस यदि अमेरिका के इस कदम का घोर विरोध करता है तो उसमें वैश्विक शक्ति संतुलन बिगड़ने की संभावना दिखाई देती हैl ऐसे में भारत को बड़े विवेक से ही शांति प्रस्तावक की भूमिका पर अपने कदम आगे बढ़ाने होंगे।

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